Gwalior,19.11.17-जहाँ एक तरफ काँग्रेस इस जीत से उत्साहित है और इसे प्रदेश में अपने वनवास की समाप्ति और भाजपा के वनवास की शुरुआत का संकेत मान रही है, वहीं दूसरी तरफ भाजपा इसे अपनी हार ही मानने को तैयार नहीं है।
उसका कहना है कि यह सीट तो कांग्रेस की पारंपरिक सीट थी जो अभी तक कांग्रेस के ही पास थी और फिर से उसी के पास चली गई। हमारे पास खोने के लिए कुछ था ही नहीं तो खोने का सवाल ही नहीं।
भाजपा की इस सोच पर गालिब का एक शेर गुस्ताखी माफ, कुछ फेरबदल के साथ अर्ज है,
"तुमको मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन,
दिल को बहलाने को गालिब ये खयाल अच्छा है ।"
क्योंकि प्रदेश के मुख्यमंत्री के तीन दिन के प्रचार, 64 सभाएँ और रोड शो, आदिवासी के यहाँ रात ठहरना, भोजन करना, इसके अलावा सरकार के 12 मंत्री, संगठन के नेताओं, यहाँ तक कि उप्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य की जनसभाओं के बाद भी अगर यह नतीजे भाजपा को अपेक्षित थे तो फिर इतने तामझाम करके शिवराज सिंह ने इस चुनाव को अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाने के संकेत क्यों दिए?
और अगर इस उपचुनाव के नतीजे भाजपा के लिए अपेक्षित नहीं थे तो क्या यह बेहतर नहीं होता कि केवल अपनी हार को  "शिरोधार्य" करने के बजाय शिवराज इस हार का आत्ममंथन करते?
क्योंक अभी तक के संकेतों के अनुसार आगामी विधानसभा चुनाव उन्हीं के नेतृत्व में लड़े जाने हैं तो प्रदेश में उन्हीं की प्रतिष्ठा का प्रश्न है। अगर भाजपा यह सोच रही है कि मोदी के नाम पर वह  प्रदेश में वोट लेने में कामयाब हो जाएगी तो उसे यह याद रखना चाहिए कि आज का वोटर समझदार हो गया है। वो न सिर्फ लोकसभा चुनाव और विधानसभा चुनावों के अन्तर को समझता है बल्कि प्रदेश के चुनावों में वो स्थानीय मुद्दों को ध्यान में रखकर ही अपना मत देता है। और यह अत्यंत खेद का विषय है कि मध्यप्रदेश का हर शहर और हर वर्ग आज स्थानीय मुद्दों से परेशान है।
लोकतंत्र में मताधिकार वो माध्यम होता है जिसके द्वारा एक आम आदमी सरकार के प्रति अपनी भावनाओं (समर्थन या विद्रोह) को व्यक्त करता है। और चित्रकूट की जनता ने भी यही किया। सत्ता में रहने के बावजूद उसने भाजपा के बजाय काँग्रेस में भरोसा व्यक्त किया क्योंकि सीट पारंपरिक हो सकती है लेकिन वोटिंग नहीं ,शायद इसीलिए चुनावों में अच्छे अच्छे दिग्गजों की जमानत तक जब्त हो जाती