चण्डीगढ़ 11 फरवरी - संसार में दुनियावी ज्ञान प्रदान करने के लिए अनेकों गुरू उपलब्ध हो सकते हैं लेकिन ब्रह्मज्ञान दुनियां में केवल वर्तमान सत्गुरूद्वारा ही प्रदान किया जाता है क्योंकि ब्रह्मज्ञान केवल जानकारी मात्र ही नहीं बल्कि इसके पीछे एक बक्शिश छिपी होती है जिसका एहसास इन्सान कोब्रह्मज्ञान को अपने जीवन में धारण करने के बाद ही पता चलता है, ये उद्गार आज सैक्टर 30-ऐ में स्थित सन्त निरंकारी सत्संग भवन में देहली से आएकेन्द्रीय सेवादल अधिकारी श्री ओ0 पी0 निरंकारी ने यहां हज़ारों की संख्या में उपस्थित श्रोताओं को सम्बोधित करते हुए व्यक्त किए ।

ब्रह्मज्ञान को जीवन में धारण करने की विधि की चर्चा करते हुए श्री निरंकारी ने बताया कि सत्गुरू माता सविन्द्र हरदेव जी महाराजद्वारा ब्रह्मज्ञान प्रदान करते समय दिए जाने वाले पांच प्रणो को जब तक जीवन में नहीं अपनाया जाता अर्थात जब तक इन्सान को यह एहसास नहींहोता कि यह तन-मन-धन किस का है और मुझे समाज में किस तरह से रहना है, अपनी जिम्मेवारियों को कैसे निभाना है, तब तक इस ब्रह्मज्ञान कोअपने जीवन में धारण नहीं किया जा सकता और न ही इसका पूर्ण लाभ उठाया जा सकता है ।

श्री निरंकारी ने आगे कहा कि जो भी इन्सान इस ब्रह्मज्ञान को जीवन में धारण कर लेता है वह हर समय कण-कण में विराजमानपरमात्मा का एहसास करता है, सुख-दुख में विचलित नहीं होता, हर समय परमात्मा का शुक्रिया अदा करता है तथा अपनी जिम्मेवारियों को चेतन्ता सेनिभाता है, किसी प्रकार का अभिमान नहीं करता, सभी से प्यार-नम्रता-भाईचारे जैसा व्यवहार करते हुए अपनी जीवन-यात्रा को तय करता चला जाता है।

इससे पूर्व यहां के संयोजक श्री नवनीत पाठक जी ने देहली से आए श्री ओ0 पी0 निरंकारी जी का सभी की ओर से स्वागत किया ।