कुल्लू(धनेश गौतम ) ,23 मार्च सृष्टि के रचियता देव श्रीबड़ा छमांहु स्वर्ग लोक से धरती लोक पर लौटते ही चवाली माता के प्रेम प्रसंग में मदहोश हो गए। चवाली माता यानिकि 44 हजार रानियों ने देवता बड़ा छमांहु को अपनी वाहों की कैद में डाल दिया। नव सवंत के दिन देवता बड़ा छमांहु तीन महीने बाद देवराज इंद्र की सभा से स्वर्ग लोक से नव संवत रविवार को लौटे। हजारों लोगों ने देवता के आगमन का स्वागत किया और देवता को सोने चांदी के आभूषणों तथा फू लों से सुसज्जित कर दर्शन किए। सराज घाटी के कोटला गांव की देवता की कोठी से भव्य रथ यात्रा का आयोजन माता चवाली के मंदिर तक हुआ। इस दौरान रथ यात्रा में हजारों लोगों ने भाग लिया। गौर रहे कि देवता बड़ा छमांहु की 44 हजार रानियां हैं और स्वर्ग लोक से लौटते ही वे सर्वप्रथम अपनी रानियों से मिलने  जाते हैं। रानियों से मिलने का यह दृश्य जहां चमत्कारी,आकर्षक व भाव विभोर करने वाला होता है वहीं यह रानियों देव रथ को अपने कब्जे में ले लेती हैं। रविवार को हजारों लोगोंं की मौजूदगी में यह दृश्य हुआ और देव मिलन के  बाद जब लोगों ने देव रथ को वापस लाना चाहा तो देव रथ एक जगह स्थिर हो गए। जिससे देवता  के भक्तजनों में देवरथ को लाने की लालसा  बढ़ी और देव रथ में रस्सा लगाकर हजारों लोगों ने खींचना शुरू किया। किंतु हजारों लोगों के बल से भी देवरथ टस से मस नहीं हुए और एक जगह स्थिर हो गए। देव हारियानों ने यह  समझ लिया था  कि आखिर उनके देवता रानियों के वश में कैद हो चुके हैं। लाख कोशिश करने के  बाद भी लोग देव रथ को नहीं खींच पाए और बाद में हारियानों ने उपाय सोचा। देव  हारियानों को पता था कि 44 हजार रानियां को जो योगनियों का रूप हैं चमड़े की जुठ लगाने से देवता को छोड़ सकती हैं। हरियानों ने देव रथ में बांधे रस्से में जब नगाड़े की जुठ लगाई तो देव रथ एकदम  छूट गए और जय घोषों के साथ लोगों ने रथ को  खींच कर वापस  कोटला गांव पहुंचाया। जहां पर सैंकड़ों महिलाओं व  अन्य लोगों ने परंपरागत तरीके से देवता का स्वागत  किया और नया सवंत पर्व  शुरू हुआ। यहां पर कोटला में सैंकड़ों महिलाएं पारंपरिक परिधानों में सजकर देवता की पूजा के लिए लाइन में खड़ी रही। हाथ में धूप, चावल, अखरोट व फूलों की थाली भरकर देवता का स्वागत किया गया। फूल व चावलों की वर्षा करके यहां महिलाओं का जो दृश्य था वह भी देव आस्था के साथ आकर्षक रहा। वहीं, देव धामणी छमांहु जो देव श्रीबड़ा छमांहु के रूप में माने जाते हैं भी बड़े भाई के स्वागत में कोटला गांव में विराजमान रहे। जैसे ही रथ यात्रा चवाली माता से वापस कोटला गांव पहुंची तो सबसे पहले महिलाओं ने फूलों की वारिश करके देवता का स्वागत किया और उसके बाद दोनों भाई देवताओं का भव्य मिलन हुआ। याद रहे कि नया  सवंत के दिन सृष्टि उत्पन्न हुई थी और देवता बड़ा छमांहु को ही सृष्टि का रचियता माना  जाता है। बड़ा छमांहु का  अर्थ है छह समुह देवताओं का एक देव। यानिकि एक रथ में  छह देवी-देवता वास करते हैं। जिसमें ब्रह्मा, विष्णू , महेश,आदी,शक्ति व शेष नाग 
 
समाहित है। यही कारण है कि जिस दिन सृष्टि उत्पन्न हुई थी उसी 
दिन देव बड़ा छमांहु भी  उत्पन्न  होते हैं। नव संवत के बाद अब सराज घाटी में देव श्रीबड़ा छमांहु व अन्य सभी छमांहु देवताओं के मेले शुरू हो जाते हैं। देवता छमांहु के शक्ति सहित पांच रथ हैं जिसमें सबसे बड़े देव बड़ा छमांहु कोटला क्षेत्र में रहते हैं। जबकि दूसरे स्थान के छमांहु पलदी छमांहु के नाम से जाने जाते हैं जो गोपालपुर कोठी में विराजमान हैं। इसके अलावा तीसरे स्थान पर खणी छमांहु विराजमान हैं यह देवरथ जिला मंडी के खणी गांव में पूजे जाते हंै। चौथे स्थान के छमांहु देवता धामणी छमांहु व थानेदार के नाम से जाने जाते हैं जो लारजी, धामण में रहते हैं। पांचवा रथ शक्ति का है जो धाराखरी गांव में विराजमान हैं। छठा आदि अनंत का रथ नहीं है जिसे अनंत शक्ति माना जाता है। बहरहाल रविवार को हजारों लोग देवता के दर्शन के  लिए  कोटला गांव पहुंचे थे और देवता के आशिर्वाद लेकर धन धान्य हुए।