चंडीगढ़,20.05.18- गायत्री छंद हैं। इसे गा सकते हैं। यह पद्य की विधा है। वेद में ऐसे कई मंत्र हैं। परंतु इस मंत्र की विशेष पहचान है। उपरोक्त शब्द आर्य समाज सेक्टर 7 में प्रवचन के दौरान डॉ. जगदीश शास्त्री ने कहे। उन्होंने कहा कि इस मंत्र का उपदेश गुरु मंत्र के रूप में गुरु देेते हैं। इसी मंत्र के साथ गुरु शिष्य को जनेऊ पहनाते हैं। इस मंत्र की दीक्षा गुरु देते हैं। गुरु चाहे जितने भी हो परंतु गुरु मंत्र एक ही होगा। वह मंत्र गायत्री है। संस्कृत में गाय को प्राण को कहते हैं। त्री का अर्थ तारना है। इसका गायन करने से प्राण पुष्ट होते हैं अर्थात व्यक्ति का जीवन सफल हो जाता है। इसके तीन चरण हैं। गायत्री ही गुरु है। ईश्वर का निज नाम ओम है। परमात्मा तीनों कालों में सत चित और आनंद है। वह सच्चिदानंद है। उसका कभी नाश नहीं होता। परमात्मा का निर्माण नहीं होता। वह सब को बनाता है परंतु उसे कोई नहीं बना सकता।