NEW DELHI,15.07.18-प्राचीन कला केन्द्र किसी पहचान का मोहताज नहीं क्योंकि भारतीय शास्त्रीय कलाओं के प्रचार एवं प्रसार में देश के सबसे अग्रणी सांस्कृतिक संस्था के रूप में स्थापित होना ही केन्द्र की पहचान है। प्राचीन कला केन्द्र कलाकारों के लिए नियमित रूप से विभिन्न कार्यक्रम देशभर में आयोजित करता आ रहा है। इसी श्रृंखला में दिल्ली में केन्द्र एवं इंडिया हैबीटेट सेंटर के सहयोग से अूमलतास सभागार में केन्द्र की 10वीं तिमाही बैठक का आयोजन किया गया। इसमें बैंगलौर की युवा एवं प्रतिभावान शास्त्रीय गायिका महालक्षमी शिनाॅए एवं दिल्ली को सधे हुए संतूर वादक राजकुमार मजूमदार ने खूबसूरत प्रस्तुतियां देकर एक यादगारी शाम को संजोया। इस कार्यक्रम में केन्द्र की रजिस्ट्ार डाॅ.शोभा कौसर,सचिव श्री सजल कौसर उपस्थित थे। मुख्य अतिथि के रूप में श्री नरेश सिरोही,सलाहाकर किसान चैनल,दूरदर्शन शिरकत की।
महालक्षमी शिनाॅए हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की एक प्रतिभाशाली गायिका है। जिन्होंने पदमभूषण ग्रेमी अवार्ड विजेता पंडित विश्वमोहन भट्ट जी के शिष्यत्व में संगीत की बारीकियों को सीखा। उन्होंने देश ही नहीं विदेशों में भी अपनी प्रतिभा का बखूबी प्रदर्शन किया।
दूसरी ओर राजकुमार मजूमदार ने परिवार से विरासत के रूप में संगीत प्राप्त किया। प्रारंभिक शिक्षा तबले में लेने के पश्चात उन्होंने संतूर की शिक्षा लेनी प्रारंभ की। पंडित भजन सोपोरी के शिष्यत्व में राजकुमार ने एक मंझे हुए संतूर वादक के रूप में खुद को स्थापित किया।
सबसे पहले महालक्षमी ने कार्यक्रम का आरंभ राग मारूबिहाग से किया। आलाप के पश्चात महालक्षमी ने विलम्बित एक ताल की रचना ‘‘ बादल आए री’’ प्रस्तुत की। उपरांत द्रुत तीन ताल में बंदिश ‘‘तरसत रैना दिना’’ प्रस्तुत की। अपने कार्यक्रम का समापन महालक्षमी ने एक मीरा भजन ‘‘दरसन बिन दुखन लागे नैना’’ से किया और दर्शकों की खूब तालियां बटोरी।
इनके साथ मंच पर अभिषेक मिश्रा ने तबले पर,परोमिता मुखर्जी ने हारमोनियम पर बखूबी संगत की।
मधुर गायन की प्रस्तुति के पश्चात राजकुमार मजूमदार ने मंच संभाला एवं उन्होंने राग हेमंत को चुना । आलाप के पश्चात जोड़ झाला की मधुर स्वर लहरियों से दर्शक मंत्रमुग्ध हो गए। इसके पश्चात तीन ताल में तीन सुंदर गतें पेश की गई। तीन ताल में नौ मात्रा एवं मध्य लय तीन ताल पर सुंदर गत पेश करके राजकुमार ने खूब प्रशंसा अर्जित की। इन्होंने कार्यक्रम का समापन द्रुत तीन ताल से किया।
इनके साथ मंच पर विश्वाजीत पाल ने तबले पर बखूबी संगत की।
केन्द्र की रजिस्ट्ार डाॅ.शोभा कौसर, सचिव श्री सजल कौसर एवं मुख्य अतिथि श्री नरेश सिरोही ने कलाकारों को सम्मानित किया। इनके साथ कला में अपने विशिष्ट योगदान के लिए आस्ट्ेलिया से आई शास्त्रीय गायिका काकोली बैनर्जी को विशेष रूप से ताम्रपत्र द्वारा सम्मानि किया गया।