बिलासपुर, 25 अक्तूबर: वन महोत्सव केवल पौधरोपण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रकृति के संरक्षण, पर्यावरण संतुलन और स्वस्थ जीवनशैली को अपनाने का भी संदेश देता है। इसी उद्देश्य के साथ मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंदर सिंह सुक्खू ने बिलासपुर जिले की घुमारवीं विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत मंगलौत वन क्षेत्र की निहारी वन बीट के दधोल कलां में गत 14 अगस्त को सहजन (मोरिंगा) का पौधा रोपित कर 77वें राज्य स्तरीय वन महोत्सव का न केवल शुभारंभ किया था, बल्कि प्रदेश सरकार की पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ औषधीय पौधों के महत्व के प्रति जन जागरूकता को लेकर एक अनूठी पहल भी की है। डीपीएफ (डिमार्केटेड प्रोटेक्टेड फॉरेस्ट)के अंतर्गत आने वाले इस वन क्षेत्र में एनपीवी योजना के तहत पांच हेक्टेयर वन भूमि में लगभग 350 मोरिंगा के पौधों सहित विभिन्न प्रजातियों के लगभग 1,000 पौधे रोपित किए गए हैं। प्रदेश सरकार की इस पहल के माध्यम से लोगों को मोरिंगा के पौधों के रोपण के लिए प्रेरित करने के साथ-साथ पोषण संबंधी महत्व और उपयोगिता के प्रति जागरूक करने का भी संदेश दिया गया है। राज्य सरकार की यह अनूठी पहल अब धीरे-धीरे फलीभूत होने लगी है।

राज्यस्तरीय वन महोत्सव के माध्यम से प्रदेश सरकार ने मोरिंगा जैसे औषधीय गुणों से भरपूर पौधे का चयन कर न केवल लोगों को पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया है, बल्कि पोषण और पर्यावरण के बीच संबंध विकसित करने की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण पहल भी साबित हो रही है। यही नहीं, पौधरोपण के माध्यम से जहां हरित क्षेत्र बढ़ाने का प्रयास किया गया है, तो वहीं मोरिंगा (सहजन) जैसे उपयोगी पौधे के प्रति जागरूकता बढ़ाने पर भी जोर दिया गया है। निश्चित तौर पर प्रदेश सरकार की यह अनूठी पहल वन महोत्सव जैसे महत्वपूर्ण कार्यक्रमों के माध्यम से औषधीय पौधों के घरेलू उपयोग के साथ-साथ पोषण संबंधी जागरूकता को बढ़ावा देने में भी सहायक साबित हो रही है।

मोरिंगा, जिसे आमतौर पर सहजन के नाम से जाना जाता है, पोषण संबंधी गुणों से भरपूर पौधा है। अलग-अलग क्षेत्रों में इसे स्थानीय नामों से भी पहचाना जाता है। यह एक बहुउपयोगी पौधा है, जिसके विभिन्न हिस्सों का इस्तेमाल भोजन और पारंपरिक उपयोगों में किया जाता है। इसके पत्ते, फूल, फलियां और बीज उपयोगी होते हैं, जबकि इसकी छाल और जड़ों का भी पारंपरिक उपयोग किया जाता रहा है। मोरिंगा की फलियों से सब्जी बनाई जाती है और दक्षिण भारतीय व्यंजनों में इसका उपयोग सांभर तैयार करने के लिए भी किया जाता है। इसके पत्तों का इस्तेमाल विभिन्न खाद्य पदार्थों में किया जा सकता है, जिससे दैनिक आहार में पोषक तत्वों को शामिल करने के अवसर बढ़ते हैं।

ऐसे में वन महोत्सव का मूल उद्देश्य लोगों को पौधरोपण के प्रति प्रेरित करना ही नहीं, बल्कि प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण सहित औषधीय पौधों के महत्व को भी समझाना है। मोरिंगा के पौधों का रोपण इस संदेश को जन-जन तक पहुंचाने का एक माध्यम बना कि प्रकृति के संरक्षण के साथ उपयोगी और पोषण देने वाले पौधों को भी अपने आसपास स्थान दिया जाना चाहिए।

इस तरह की पहल आम लोगों को वन संपदा के महत्व को समझने और पर्यावरण संरक्षण में अपनी भूमिका निभाने के लिए प्रेरित करती है। औषधीय वनस्पतियों का संरक्षण, हरित आवरण में वृद्धि और प्राकृतिक संसाधनों का सतत उपयोग ऐसे विषय हैं, जिनमें सरकारी प्रयासों के साथ जनभागीदारी भी महत्वपूर्ण है।

*क्या कहते हैं मंत्री:

नगर व ग्राम नियोजन, आवास तथा तकनीकी शिक्षा मंत्री राजेश धर्माणी का कहना है कि मोरिंगा में लगभग 17 प्रकार के पोषक तत्व पाए जाते हैं। यह एक मैजिक प्लांट है। बड़े होने पर इसके पत्ते, फूल, छाल, जड़ों सहित सभी भाग काम में आते हैं। इसके फल से सब्जी बनती है, सांभर बनाने में भी इसका उपयोग किया जाता है।

उन्होंने कहा कि राज्य स्तरीय वन महोत्सव के माध्यम से मोरिंगा का पौधरोपण कर प्रदेश सरकार ने व्यापक जन जागरूकता लाने का प्रयास किया है, ताकि लोग इस पौधे को लगाएं और इसके औषधीय गुणों का लाभ उठाते हुए स्वस्थ रहें।