चंडीगढ़, 10 फरवरी: पंजाबी में प्रकाशित ‘ऐवरेस्ट 1996’, किताब की सफलता के बाद इसके लेखक मोहिंदर सिंह, कमांडेंट (सेवानिवृत), आईटीबीपी ने अब इसका हिंदी स्वरूप ‘1996 में ऐवरेस्ट की जीत की गौरवमई गाथा’ को प्रस्तुत किया है। इस किताब में 1996 में माउंट ऐवरेस्ट पर हासिल की गई जीत की गौरवमई गाथा को रोमांचक अंदाज में प्रस्तुत किया गया है। हिंदी में प्रस्तुत की गई इस किताब को आज श्री अरविंद कुमार, आईपीएस, द्वारा आईटीबीपी, ट्रांसपोर्ट बटालियन, बहलाना कैम्प, निकट एयरपोर्ट, चंडीगढ़ में रिलीज किया गया।

ऐवरेस्ट को 1953 से 13 अलग अलग तय रास्तों से जीता जा रहा है, पर सबसे दुर्गम और कठिन रास्ता नॉर्थ कॉलम-तिब्बत (चीन) से है।

यूनिस्टार बुक्स प्राइवेट लिमिटेड, चंडीगढ़ द्वारा प्रकाशित ‘1996 में ऐवरेस्ट की जीत की गौरवमई गाथा’, एक रोमांचक कहानी है, जिसमें पर्वतारोहियों में इस चोटी को जीतने का दृढ़संकल्प है और वे बेहद ठंड, बर्फबारी के बीच भी आगे बढ़ते हुए इस पर जीत दर्ज करते हैं। इस दौरान बेहद मुश्किल चढ़ाई, क्लिफ वॉक, विश्व के शिखर पर डैथ ट्रैप, डैड क्लाइबर्स वॉक और आखिरी सांस तक आगे बढऩे की इच्छा के साथ ही इस पर जीत हासिल की जा सकती है। वहीं इस जीत के लिए पर्वतारोहियों को शारीरिक और मानसिक आकलन से भी गुजरना पड़ता है और उसी के आधार पर उनको चुना जाता है।

किताब में कदम दर कदम इस चोटी को जीतने की कहानी बताई गई है और मानवीय प्रयासों की इस शानदार गाथा को बेहद रोमांचक और नाटकीय अंदाज में प्रस्तुत किया गया है। इस दौरान बेहद रोंगटे खड़े कर देने वाले अनुभव, बार-बार मिलने वाली चुनौतियां, कई बार समक्ष दिख रही हार, मुश्किल लक्ष्य, कठिन रास्ते, पूरी तरह से बंद लगने वाले रास्ते, दर्द और तीन साथियों की दर्दनाक मौत, थकान और बैचेनी, हादसे और अन्य सभी मुश्किलों के बाद मिलने वाली जीत में भी खुशियां, उदासी और आनंद की मौजूदगी रहती है।

किताब में लेखक ने 78 दिनों के पर्वतारोहन के रोमांच को पिरोया है। किताब एक इतिहासिक उपलब्धि के साथ समाप्त होती है जिसमें टीम शिखर पर पहुंच जाती है लेकिन उससे पहले टीम के 3 सदस्यों को अपनी जान भी खोनी पड़ती है जो कि बेहद भयंकर बर्फीले तूफान में फंस जाते हैं। उनका गम इस जीत के दौरान भी लगातार बना रहता है।

संसार का सर्वोच्च शिखर ऐवरेस्ट चिरकाल से मानवीय साहस के लिए एक वंगार बना हुआ। आरोही निरन्तर इस उच्चतम शिखर की ओर आकर्षित होते रहे हैं जहाँ मृत्यु व जीवन की विभाजन रेखा अत्यन्त धूमिल है, हर पग पर एक नया •ाोखिम आपकी राह जोहता है, लेकिन पर्वत प्रेमी सब बाधाओं से जूझते बढ़े चले जाते हैं। आखिरकार यह सब कैसे हो पाता है, इस के पीछे का रहस्य क्या है ? यह मन को वश में कर लेने वाली दास्ताँ है। पर्वतों को सर करने और प्रकृति के भयावह प्रतिघातों का सामना करने का पर्वतारहियों का वो अनूठा दृढ़ निस्चय, फौलादी चरित्र, कुर्बानी का सहज स्वीकार, सीधी खड़ी चट्टानों के मस्तक पर पाँव रख कर बढ़े चले जाने का कौतूहल, संसार की उच्चतम बुलन्दियों पे बिछा मृत्यु-जाल, इस सब के मध्य में बड़े जाते छोटे-छोटे कदम, मानो मृत्यु को पाँवों तले रौंदे चले जाते हों।

यह पुस्तक ऐसे ही रोमांचक रहस्यों को पर्त दर पर्त खोलती है। यह शौर्य गाथा है उस अखण्ड मानवीय प्रयास की जो असंख्य बाधायों के समक्ष डोलता नहीं, कड़ी से कड़ी विपदायों की वर्षा में अडोल, पराजयों के क्रूर आघात, उम्मीदों से धडक़ते अनुमान, लालायित करती मं•िालें। तीन वीरों की त्रासदिक मृत्यु की वेदना व क्षोभ, दुशचिन्ताओं का सन्ताप, विजय एवं दुखान्त, खुशी और निराशा, खट्टे-मीठे अनुभव, टीस भरे आनंद। यह कथा इन सब का अनूठा संगम है।

ऐवरेस्ट (उत्तरी-कोल) 1996 के अभियान के दिन-प्रतिदिन के वृतान्त को प्रस्तुत करती यह पुस्तक हृदय की गहराईयों के नये मार्ग खोलती है। इस में झलकीयां हैं उद्देश्य के प्रति समर्पण की, ध्येय की खातिर दु:ख झेलने के दृढ़ निश्चय की, शुद्धतम व$फा की, आपदायों के समक्ष भारतीय सैन्य बलों के अदम्य साहस की और विकट स्थितियों में सर्वोत्तम और निर्मम नेतृत्व की।

इससे पहले कि विजयोल्लास की ध्वनियां पर्वतारोहण के इतिहास के पक्षों तले दब के रह जायें, देश इण्डो-तिब्बतीयन सीमा बल एवं उन सभी सदस्यों को सैल्यूट करता है जिन्होंने देश की आन, शान और नाम को बुलन्द किया है।

महिन्द्र सिंह पर्वतारोहण के क्षेत्र में एक चिर-परिचित नाम है। पर्वतारोही पुरस्कार से सम्मानित महिन्द्र सिंह, जो कि पेशे से सिवल इंजीनियर हैं, इण्डो-तिब्बतीयन सीमा बल में 35 वर्ष तक सेवा करने के उपरान्त कमाण्डेंट के रूप में सेवा निवृत हुए। आप का जन्म भारत के पंजाब प्रान्त के जिला होशियारपुर के एक गाँव ‘राजपुर भाईयाँ’ में हुआ जो कि शिवालिक की पर्वत शृंखला में स्थित है। निरन्तर 25 वर्षों तक वह भारतीय हिमालय में पर्वतारोहण के क्षेत्र में सक्रिय रहे हैं। इसी के साथ यूरोप के प्रसिद्ध ऐलपस पर्वत अभियान से भी जुड़े रहे हैं। वह उत्तरी कोल (तिब्बत) चीन मार्ग से ऐवरेस्ट $फतह करने वाले सर्वप्रथम भारतीय दल के लीडर भी रहे। इण्डो-मंगोलीयन सांस्कृतिक आदान-प्रदान के प्रोग्राम में मंगोल सरकार ने उन्हें ‘खान ग्रिड’ की उपाधि से सम्मानित किया। लेह-लद्दाख, उत्तर प्रदेश और हिमाचल में कराकुर्म से कुमाऊँ हिमालय क्षेत्र में सेवा के दौरान उन्होंने कई उपलब्धियाँ हासिल कीं। उनकी कुछ पर्वतारोही प्राप्तियों और मुहिमों का वर्णन नीचे प्रस्तुत किया जा रहा है।

आस्ट्रीया (यूरोप) में एडवांस पर्वतारोहण गाईड एवं बचाव कोर्स, ऐलपस की 03 चोटी पर आरोहण (यूरोप, 1971), नीलकंठ अभियान के डिप्टी लीडर। (अविजित शिखरों पर प्रथम विजय के विश्व-प्रतिमान) 7 जून 1973 में सासेर कांगड़ी-ढ्ढ, 1970 में त्रिशूल शिखर (7120 मीटर) ढ्ढ, बेनाम शिखर (6065 मीटर), 1972 में पाँचा-चुली (6037 मीटर)। वह आउली (जोशीमठ) में ढ्ढञ्जक्चक्क के स्काई और पर्वतारोही इन्स्टीच्यूट के संस्थापक रहहे और वहाँ ट्रेनिंग ऑफीसर और बाद में प्रिंसीपल भी रहे।

वह 1975 में टुनयी चोटी, गंगोत्री शिखर (1976), नंदा देवी (1978 और 1979), भागीरथी ढ्ढ (1980), नंदाकोट (1981), पूर्वी नंदा देवी (1982) के विदेशी संयुक्त अभियानों में भी शामिल रहे। 1991 में उन्होंने बाँबा धुरा शिखर (6335 मीटर) अभियान और 1992 की बेनाम चोटियोँ (6172, 6075 मीटर) के सफल अभियान का नेतृत्व किया। अप्रैल-जून 1993 में इण्डो-यूक्रेन के कंचनजंगा अभियान में वह एक सदस्य और लायसन आ$फीसर के रूप में शामिल हुए। 1994 नवम्बर में जुआनवली शिखर (21760 फीट) के इण्डो-मंगोलीया के सफल अभियान के लीडर रहे। अगस्त 1995 में ‘माना चोटी’ (23860 फीट) के अग्रिम शिखर आरोही रहे। 6725, 6489, 6449 मीटर की तीन बेनाम चोटियों के अभियान में आपने यह श्रेय हासिल किया।

महिन्द्र सिंह को 15 से अधिक बार पुरस्कारों और प्रशस्तिपत्रों से सम्मानित किया गया है। अलग-अलग अवसरों पर विशेष चुनौतियों और कार्यभारों को कुशलतापूर्वक निभाने के लिए सरकारी तौर पर अनेक बार प्रशंसा के भागी बने, पर्वतीय बचाव/राहत अभियानों का लंबे समय तक अंग रहे। आप की इन स्मरणीय सेवायों को देखते हुए 1997 में आपको इण्डियन पुलीस मैडल (ढ्ढक्करू) और 1998 में पंजाब सरकार की तरफ से महाराजा रणजीत सिंह पुरस्कार से सम्मानित किया गया।