बिलासपुर में केंद्रीय विद्यालय घुमारवीं की विद्यालय प्रबंधन समिति की बैठक आयोजित
बिलासपुर, 26 फरवरी: केंद्रीय विद्यालय घुमारवीं की विद्यालय प्रबंधन समिति की बैठक का आयोजन आज उपायुक्त कार्यालय बिलासपुर में उपायुक्त राहुल कुमार की अध्यक्षता में किया गया। बैठक में विद्यालय से जुड़े विभिन्न महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तृत चर्चा की गई तथा भावी योजनाओं की रूपरेखा पर विचार-विमर्श किया गया।
बैठक के दौरान विद्यालय भवन की वर्तमान स्थिति पर विस्तार से चर्चा की गई। वर्तमान में विद्यालय दो अलग-अलग स्थानों पर संचालित हो रहा है, जिसके कारण व्यवस्थागत चुनौतियां उत्पन्न हो रही हैं। इस संदर्भ में विद्यालय के मुख्य अस्थायी भवन के मरम्मत कार्य को शीघ्र पूरा करने की आवश्यकता पर बल दिया गया, ताकि विद्यार्थियों को बेहतर शैक्षणिक वातावरण उपलब्ध कराया जा सके।
वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए संविदा शिक्षकों के चयन हेतु साक्षात्कार आयोजित करने के विषय पर भी चर्चा की गई। समिति ने आगामी सत्र में पारदर्शी एवं गुणवत्तापूर्ण प्रक्रिया के माध्यम से योग्य शिक्षकों की नियुक्ति सुनिश्चित करने पर जोर दिया, जिससे विद्यार्थियों को उच्च स्तरीय शिक्षा मिल सके।
विद्यालय के दो स्थानों पर संचालन के कारण शिक्षण की गुणवत्ता को और सुदृढ़ बनाने के उद्देश्य से कक्षाओं में इंटरैक्टिव पैनल स्थापित करने की आवश्यकता पर विचार किया गया। समिति ने आधुनिक शिक्षण साधनों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक कदम उठाने का निर्णय लिया, ताकि डिजिटल माध्यमों से पढ़ाई को अधिक प्रभावी बनाया जा सके।
विद्यालय भवन निर्माण एवं भूमि हस्तांतरण के विषय में राज्य सरकार से केंद्रीय विद्यालय संगठन को भूमि स्थानांतरण की प्रक्रिया शीघ्र पूर्ण कराने पर भी चर्चा हुई, जिससे भविष्य में विद्यालय को अपना स्थायी भवन प्राप्त हो सके और सभी गतिविधियां एक ही परिसर में संचालित की जा सकें।
बैठक में वित्त वर्ष 2026-27 के बजट प्रस्तावों की समीक्षा की गई तथा कक्षा प्रथम से पांचवीं तक छात्र नामांकन बढ़ाने के लिए विशेष प्रयास करने पर बल दिया गया। विद्यालय की प्रधानाचार्य रिंकु कुमारी ने विद्यालय से संबंधित विभिन्न समस्याएं एवं आवश्यकताएं समिति के समक्ष रखीं।
इस अवसर पर एसडीएम घुमारवीं गौरव चैधरी, सीडीपीओ घुमारवीं रंजना तथा विद्यालय प्रबंधन समिति के अन्य सदस्य उपस्थित रहे।
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राज्य स्तरीय नलवाड़ी मेला का लोगो डिजाइन आमंत्रित, 10 मार्च तक प्रस्तुत कर सकते हैं डिजाइन
चयनित डिजाइन बनेगा मेले का आधिकारिक लोगो, प्रतिभागियों को मिलेंगे आकर्षक ईनाम
बिलासपुर, 26 फरवरी: उपायुक्त बिलासपुर राहुल कुमार ने जानकारी देते हुए बताया कि राज्य स्तरीय नलवाड़ी मेला-2026 के लिए आधिकारिक लोगो डिजाइन आमंत्रित किये गए हैं। उन्होंने कहा कि प्रस्तुत किया जाने वाला लोगो डिजाइन केवल कलात्मक ही नहीं, बल्कि नलवाड़ी मेले के ऐतिहासिक महत्व, पारंपरिक स्वरूप, सांस्कृतिक झलक, स्थानीय पहचान तथा लोक संस्कृति की गौरवशाली परंपरा को दर्शाने वाला होना चाहिए। उन्होंने कहा कि यह लोगो केवल हाथ के माध्यम से ही तैयार किया होना चाहिए तथा एआई द्वारा तैयार लोगो मान्य नहीं होगा।
उन्होंने कहा कि बेहतर डिजाइन प्रस्तुत करने वाले व्यक्तियों को जिला प्रशासन उचित ईनामी राशि प्रदान करेगा। जिनमें प्रथम पुरस्कार 11 हजार, द्वितीय पुरस्कार 51 सौ, तृतीय पुरस्कार 21 सौ रूपये का रहेगा। इसके अतिरिक्त 10 सांत्वना पुरस्कार भी प्रदान किये जाएंगे।
उन्होंने बताया कि इच्छुक व्यक्ति एवं छात्र आगामी 10 मार्च तक जिला लोक संपर्क अधिकारी कार्यालय को डिजाइन किया हुआ लोगो प्रस्तुत कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि प्रस्तुत लोगो का मूल्यांकन गठित समिति द्वारा किया जाएगा तथा बेहतरीन लोगो डिजाइन को मेले का आधिकारिक लोगो बनाया जाएगा।
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गरामोड़ा टोल बैरियर की ई-ऑक्शन 28 फरवरी को
बिलासपुर, 26 फरवरी: जिला बिलासपुर में गरामोड़ा टोल बैरियर की ई-ऑक्शन प्रक्रिया 28 फरवरी को आयोजित की जाएगी। यह जानकारी उपायुक्त बिलासपुर राहुल कुमार ने देते हुए बताया कि टोल बैरियर के संचालन के लिए ई-नीलामी पारदर्शी ऑनलाइन माध्यम से संपन्न की जाएगी।
उपायुक्त ने संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि ई-नीलामी प्रक्रिया सुचारू रूप से संपन्न हो तथा सभी औपचारिकताएं निर्धारित समयावधि में पूरी की जाएं। जिला प्रशासन ने इच्छुक प्रतिभागियों से अपील की है कि वह समय रहते आवश्यक पंजीकरण एवं दस्तावेजी प्रक्रिया पूर्ण कर लें।
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बिलासपुर में शराब के ठेकों की ऑनलाइन नीलामी 3 मार्च को
बिलासपुर 26 फरवरी: हिमाचल प्रदेश में वर्ष 2026-27 के लिए खुदरा शराब ठेकों के आवंटन की नई ऑनलाइन ई-नीलामी व्यवस्था के तहत जिला बिलासपुर में यह प्रक्रिया 3 मार्च को आयोजित की जाएगी। इस बारे उपायुक्त बिलासपुर राहुल कुमार ने जानकारी देते हुए बताया कि राज्य सरकार के निर्देशानुसार इस बार ठेकों का आवंटन ऑनलाइन प्रणाली के माध्यम से किया जा रहा है।
उन्होंने बताया कि इच्छुक एवं पात्र आवेदक निर्धारित पोर्टल पर पंजीकरण कर आवश्यक औपचारिकताओं को समय पर पूर्ण कर लें।
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सड़क सुरक्षा अभियान के अंतर्गत बरमाणा में जागरूकता एवं स्वास्थ्य जांच शिविर आयोजित
बिलासपुर, 26 फरवरी : सड़क सुरक्षा अभियान के अंतर्गत बुधवार को बरमाणा में जागरूकता एवं सामुदायिक परामर्श आधारित स्वास्थ्य जांच शिविर का आयोजन किया गया। इस शिविर का उद्देश्य भारी वाहन चालकों को सड़क सुरक्षा के प्रति जागरूक करने के साथ-साथ उनके स्वास्थ्य की नियमित जांच सुनिश्चित करना था, ताकि सुरक्षित और जिम्मेदार परिवहन व्यवस्था को बढ़ावा दिया जा सके।
शिविर में क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय बिलासपुर तथा स्वास्थ्य खंड मार्कंड की टीम ने संयुक्त रूप से भाग लिया। कार्यक्रम के दौरान उपस्थित चालकों को यातायात नियमों की जानकारी दी गई तथा सुरक्षित ड्राइविंग के महत्व पर विस्तार से चर्चा की गई। इस अवसर पर कुल 75 ट्रक चालक उपस्थित रहे।
स्वास्थ्य जांच के अंतर्गत 62 चालकों की एचआईवी एवं सिफिलिस की स्क्रीनिंग की गई। इसके अतिरिक्त 27 चालकों का रक्त शर्करा परीक्षण तथा 22 चालकों की नेत्र जांच भी की गई। चिकित्सकों ने चालकों को संतुलित आहार, नियमित स्वास्थ्य परीक्षण तथा लंबी दूरी की ड्राइविंग के दौरान आवश्यक सावधानियां बरतने की सलाह दी।
क्षेत्रीय परिवहन अधिकारी राजेश कुमार कौशल ने जानकारी देते हुए बताया कि सड़क सुरक्षा केवल नियमों के पालन तक सीमित नहीं है, बल्कि चालक के शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य से भी सीधे तौर पर जुड़ी है। उन्होंने कहा कि भविष्य में भी ऐसे जागरूकता एवं स्वास्थ्य जांच शिविर आयोजित किए जाते रहेंगे, ताकि सड़क दुर्घटनाओं में कमी लाई जा सके और परिवहन व्यवस्था को अधिक सुरक्षित बनाया जा सके।
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फीचर) (पारंपरिक हुनर )-जसवाणी के रिखी राम बांस से निर्मित उत्पादों से कर रहे जीवन निर्वाह
73 वर्ष की आयु में भी पारंपरिक बांस के उत्पादों को प्रतिदिन करते हैं तैयार
लेकिन बाजार में प्लास्टिक की दस्तक से पारंपरिक बांस उत्पादों की घटी है मांग
बिलासपुर, 26 फरवरी: जिला बिलासपुर की तहसील घुमारवीं के गांव जसवाणी निवासी 73 वर्षीय रिखी राम आज भी हाथों की मेहनत और पारंपरिक हुनर के बल पर जीवन निर्वाह कर रहे हैं। लेकिन बदलते वक्त के साथ उनके चेहरे की झुर्रियों में एक चिंता साफ दिखाई दे रही है कि पीढ़ियों से चली आ रही बांस और लकड़ी के शिल्प की परंपरा अब धीरे-धीरे समाप्ति की कगार पर पहुंच चुकी है।
बेहद हंसमुख स्वभाव के धनी रिखी राम बताते हैं कि जीवन के शुरुआती लगभग 15 वर्ष पढ़ाई में लगाए, लेकिन आठवीं कक्षा में अंग्रेजी विषय में फेल होने के कारण स्कूल छोड़ दिया। पास के गांव भदरोग में लगभग 10-12 वर्षों तक लकड़ी की कारीगरी का काम सीखा। कठिन परिश्रम और लगन से काष्ठकला में महारत हासिल की। समय के साथ वह अकेले ही रोजगार की तलाश में हिमाचल के विभिन्न क्षेत्रों जिनमें जिला शिमला, सिरमौर आदि शामिल है में जाकर लकड़ी का कार्य किया। उनका कहना है कि प्रदेश के पहाड़ी इलाकों में लकड़ी के मकान, दरवाजे-खिड़कियां और अन्य पारंपरिक निर्माण कार्यों में उनकी कारीगरी की काफी मांग रहती थी।
लेकिन दुर्भाग्यवश लगभग 10 वर्ष पूर्व जसवाणी में मकान का काम करते समय हाथ में गंभीर चोट आई और हड्डियां टूट गईं। इस घटना के बाद भारी लकड़ी का कार्य छोड़ना पड़ा। ऐसे में जीवन यापन का संकट सामने था, लेकिन हार नहीं मानी। बांस से टोकरी, खारे और छडोलू (पारंपरिक बांस के बर्तन) बनाने का कार्य शुरू किया। लकड़ी के मुकाबले यह काम अपेक्षाकृत हल्का था और गांव में इसकी मांग भी थी।
रिखी राम कहते हैं कि कुछ वर्षों तक सब कुछ ठीक-ठाक चलता रहा, लेकिन फिर बाजार की बदलती तस्वीर ने उनकी मेहनत पर पानी फेर दिया। वर्तमान में लोग प्लास्टिक से निर्मित सामान की ओर अधिक आकर्षित हो रहे हैं। बाजार में सस्ता और टिकाऊ विकल्प मिलने से पारंपरिक बांस उत्पादों की मांग अब काफी कम हो गई है।
उनका कहना है कि कभी हर घर में बांस की टोकरी और खारे का उपयोग होता था, लेकिन आज सिर्फ खास मौकों तक ही सीमित हो गया है। रिखी राम कहते हैं कि पहले कच्चा माल (बांस) आसानी से आसपास के गांव में मिल जाता था, लेकिन अब बांस मिलना भी मुश्किल हो गया है। कच्चा माल (बांस) की तलाश में अब उनके जैसे कारीगरों को गांव-गांव भटकना पड़ता है तथा बहुत कम मात्रा में यह उपलब्ध हो पाता है। ऐसे में सिर्फ कच्चे माल की कमी ही नहीं, बल्कि तेजी से बदलती जीवनशैली भी इस परंपरा के लिए खतरा बन गई है।
रिखी राम की सबसे बड़ी चिंता यह है कि नई पीढ़ी इस काम से दूर भाग रही है। युवा इसे मेहनत वाला और कम आमदनी वाला पेशा मानते हैं। आधुनिक शिक्षा और नौकरी की दौड़ में पारंपरिक कारीगरी व शिल्पकारी को महत्व नहीं मिल पा रहा है। हालांकि, रिखी राम ने इस उम्मीद के साथ बेटे को यह हुनर सिखाया है कि वह इस परंपरा को आगे बढ़ाएगा। लेकिन वह मानते हैं कि केवल कुछेक लोगों के प्रयास मात्र से यह कला अब लंबे वक्त तक जीवित नहीं रह सकती है।
यह कहानी सिर्फ रिखी राम की नहीं, बल्कि उन सैकड़ों पारंपरिक कारीगरों और शिल्पकारों की भी है जिनकी कला अब बाजारवाद और आधुनिकता की आंधी में कहीं विलुप्त होती जा रही है। ऐसे में समाज ने मिलकर ऐसे कारीगरों को प्रोत्साहन, कच्चे माल की उपलब्धता और बाजार तक पहुंच सुनिश्चित नहीं की, तो बांस और लकड़ी की यह पारंपरिक कारीगरी कहीं इतिहास के पन्नों में दफन होकर न रह जाए।
क्या है कारीगरों और शिल्पकारों के लिए सरकारी सहायता एवं योजना :
सरकार ने पारंपरिक कारीगरों और शिल्पकारों की सहायता के लिए विश्वकर्मा योजना चलाई है। इस योजना के माध्यम से जहां टूल किट खरीदने के लिए 15 हजार रुपये का अनुदान दिया जाता है तो वहीं सस्ती दरों पर ऋण की सुविधा भी प्रदान की जा रही है। इसके अतिरिक्त पांच दिन का एडवांस प्रशिक्षण भी प्रदान किया जाता है। योजना के संबंध में अधिक जानकारी के लिए महाप्रबंधक जिला उद्योग केंद्र या अपने नजदीकी प्रसार अधिकारी (उद्योग) स्थित बीडीओ कार्यालय से संपर्क कर सकते हैं।