चण्डीगढ़ , 07.07.26- : डीएवी कॉलेज, सेक्टर-10, चंडीगढ़ की गवर्निंग बॉडी ने कंप्यूटर साइंस विभाग की सहायक प्रोफेसर मंदीप जोसन की सेवाएं 3 जुलाई, 2026 से समाप्त कर दी हैं। वह लगभग 13 वर्षों तक सीएमजे विश्वविद्यालय, शिलांग (मेघालय) की अमान्य पीएच.डी. डिग्री के आधार पर कार्यरत रही थीं।

कॉलेज गवर्निंग बॉडी के महासचिव अजय सूरी द्वारा जारी सेवा-समाप्ति आदेश में कहा गया है कि यह कार्रवाई पंजाब विश्वविद्यालय द्वारा उनकी नियुक्ति की स्वीकृति वापस लिए जाने तथा सीएमजे विश्वविद्यालय की पीएच.डी. डिग्रियों को अवैध घोषित करने वाले न्यायिक एवं वैधानिक निर्णयों के अनुपालन में की गई है। आदेश में कार्यवाहक प्राचार्य डॉ. मोना नारंग को निर्देश दिया गया है कि वे मंदीप जोसन को तत्काल प्रभाव से सेवा से मुक्त करें।

उल्लेखनीय है कि 30 अप्रैल, 2013 को मेघालय के राज्यपाल (सीएमजे विश्वविद्यालय के विज़िटर) ने विश्वविद्यालय द्वारा प्रदान की गई डिग्रियों को अमान्य घोषित कर दिया था। इसके बाद 27 जुलाई, 2013 को पंजाब विश्वविद्यालय सिंडिकेट ने इन डिग्रियों को मान्यता देने से इंकार कर दिया। 13 सितंबर, 2013 को सर्वोच्च न्यायालय ने भी इन डिग्रियों की अवैधता की पुष्टि की। अंततः 31 मार्च, 2014 को मेघालय सरकार ने पंजीकृत डाक के माध्यम से स्वयं मंदीप जोसन को सूचित कर दिया कि उनकी पीएच.डी. डिग्री अमान्य है। इसके बावजूद वह जुलाई 2026 तक लगातार अध्यापन कार्य करती रहीं।

पंजाब विश्वविद्यालय सिंडिकेट के निर्णय के बाद शैक्षणिक सत्र 2013-14 में सीएमजे विश्वविद्यालय की डिग्रियों के आधार पर प्रवेश प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों तथा नियुक्त अन्य कर्मचारियों को हटा दिया गया था, किंतु केवल मंदीप जोसन को सेवा में बनाए रखा गया। इस संबंध में तत्कालीन कुलपति प्रो. अरुण कुमार ग्रोवर, जिन्होंने उनकी नियुक्ति को स्वीकृति प्रदान की, तथा डीएवी कॉलेज के तत्कालीन प्राचार्य, पंजाब विश्वविद्यालय सीनेट के सदस्य एवं मंदीप जोसन के पिता डॉ. बी. सी. जोसन की भूमिका पर गंभीर प्रश्न उठते रहे हैं। आरोप है कि उन्होंने उनकी चयन प्रक्रिया, नियुक्ति तथा विश्वविद्यालय से अनुमोदन दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

इस पूरे मामले को चंडीगढ़ के आरटीआई कार्यकर्ता डॉ. राजिंदर के. सिंगला ने लगातार आरटीआई आवेदनों, शिकायतों तथा जनहित अभियान के माध्यम से उठाया। उनके प्रयासों के परिणामस्वरूप यह मामला प्रिंट एवं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में व्यापक रूप से प्रकाशित हुआ तथा पंजाब विश्वविद्यालय की सीनेट एवं सिंडिकेट की बैठकों में भी चर्चा का विषय बना। इसके बाद विश्वविद्यालय ने अशोक गोयल की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय जांच समिति गठित की, जिसने मेघालय जाकर सीएमजे विश्वविद्यालय की डिग्रियों का सत्यापन किया ।

समिति ने 29 नवंबर, 2018 को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसे 8 दिसंबर, 2018 को पंजाब विश्वविद्यालय सिंडिकेट ने स्वीकार कर लिया । समिति ने मंदीप जोसन तथा एक अन्य शिक्षक गगनदीप सिंह बराड़ की पीएच.डी. डिग्रियों को अमान्य घोषित करते हुए पूरे प्रकरण में शामिल व्यक्तियों के विरुद्ध दीवानी एवं आपराधिक कार्रवाई की अनुशंसा की। इसके बावजूद विश्वविद्यालय के लगातार बदलते प्रशासन द्वारा लगभग आठ वर्षों तक कोई कार्रवाई नहीं की गई।

जांच रिपोर्ट के संभावित परिणामों को देखते हुए गगनदीप सिंह बराड़ ने नौकरी छोड़ दी और बाद में विदेश चले गए। इसके विपरीत, मंदीप जोसन कथित रूप से डीएवी कॉलेज तथा संबद्ध पंजाब विश्वविद्यालय के अधिकारियों के संरक्षण में सेवा करती रहीं।

3 जुलाई, 2026 को डीएवी प्रबंधन ने शालिका रानी, सहायक प्रोफेसर (वाणिज्य), डीएवी कॉलेज, जलालाबाद तथा विनोद कुमार , सहायक प्रोफेसर (कंप्यूटर साइंस), डीएवी कॉलेज फॉर विमेन, फिरोजपुर की सेवाएं भी समाप्त कर दीं। इन दोनों की नियुक्तियां भी सीएमजे विश्वविद्यालय की अमान्य पीएच.डी. डिग्रियों के आधार पर हुई थीं तथा बताया जाता है कि दोनों का संबंध भी डॉ. बी. सी. जोसन से है।


इस घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए डॉ. राजिंदर के. सिंगला ने कहा कि यह कार्रवाई उच्च शिक्षा में शैक्षणिक ईमानदारी, पारदर्शिता एवं जवाबदेही की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। उन्होंने कहा कि केवल सेवा समाप्ति पर्याप्त नहीं है। इस पूरे प्रकरण में कथित धोखाधड़ी, पद के दुरुपयोग तथा षड्यंत्र में शामिल सभी व्यक्तियों के विरुद्ध दीवानी, आपराधिक एवं विभागीय कार्रवाई की जानी चाहिए । साथ ही, फर्जी डिग्रियों के आधार पर नियुक्त व्यक्तियों को वर्षों तक दिए गए वेतन एवं अन्य सरकारी/सार्वजनिक धन की भी विधिसम्मत वसूली की जानी चाहिए।