CHANDIGARH,14.03.26-टैगोर थिएटर में आयोजित हो रहे 55वें अखिल भारतीय भास्कर राव नृत्य एवं संगीत सम्मेलन के दूसरे दिन शास्त्रीय संगीत और नृत्य की अद्भुत संगति ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। कार्यक्रम में प्रख्यात सितार वादक पंडित पूर्वायन चटर्जी की मनोहारी सितार वादन प्रस्तुति तथा सुप्रसिद्ध नृत्यांगना एवं कोरियोग्राफर विदुषी शर्मिला बिस्वास एवं उनके दल द्वारा प्रस्तुत ओडिसी नृत्य ने दर्शकों का दिल जीत लिया।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रो. शशि प्रताप शाही, कुलपति, मगध विश्वविद्यालय, बोधगया रहे। इस अवसर पर केंद्र के अध्यक्ष श्री एस.के. मोंगा, रजिस्ट्रार डॉ. शोभा कोसर तथा सचिव श्री सजल कोसर ने मुख्य अतिथि का पुष्प, उत्तरीय और स्मृति-चिह्न भेंट कर स्वागत व सम्मान किया।
संगीत संध्या का शुभारंभ भारत के अग्रणी सितार वादकों में से एक पंडित पूर्वायन चटर्जी की प्रभावशाली सितार वादन प्रस्तुति से हुआ। पंडित चटर्जी भारतीय शास्त्रीय संगीत को विश्व के विभिन्न संगीत रूपों से जोड़ने के लिए विशेष रूप से जाने जाते हैं। उन्होंने अपने कई अंतरराष्ट्रीय एल्बमों और विश्व के प्रतिष्ठित कलाकारों के साथ सहयोग के माध्यम से वैश्विक स्तर पर विशिष्ट पहचान बनाई है।
उन्होंने अपने वादन की शुरुआत राग पूरिया धनाश्री से की, जिसमें राग की गहनता और सूक्ष्मताओं को अत्यंत निपुणता के साथ प्रस्तुत किया। इसके बाद उन्होंने राग हमीर की जीवंत प्रस्तुति दी, जिसमें उनकी राग विस्तार और लयकारी पर अद्भुत पकड़ देखने को मिली। अंत में उन्होंने मिश्र आवर्तन–विवर्तन में ठुमरी प्रस्तुत कर अपनी प्रस्तुति का समापन किया, जिसे दर्शकों ने भरपूर सराहना दी।
इसके पश्चात विदुषी शर्मिला बिस्वास ने अपने दल के साथ मंच संभालते हुए ओडिसी नृत्य नाटिका “पगडंडी” प्रस्तुत की। इस प्रस्तुति की शुरुआत ऊर्जा और उल्लास से भरपूर नृत्य से हुई, जिसकी प्रेरणा भारतीय पारंपरिक सड़क खेलों की चंचलता और जीवंतता से ली गई थी। तकनीकी दक्षता, रोचक कथात्मक शैली और तीव्र लयात्मकता से भरपूर इस प्रस्तुति ने मंच को जीवंत और कल्पनाशील ऊर्जा से भर दिया।
प्रस्तुति का एक महत्वपूर्ण अंश “विलासिनी : ए वुमन रोमांसिंग विद लाइफ” था, जो ओडिशा की मंदिर नर्तकियों को समर्पित एक भावपूर्ण श्रद्धांजलि थी। यह रचना दिवंगत महारियों शशिमणि और परशमणि के साथ शर्मिला बिस्वास के आत्मीय संबंधों से प्रेरित है। इसमें एक वृद्ध, सेवानिवृत्त नर्तकी की भावनात्मक यात्रा को दर्शाया गया, जो अपने अतीत की स्मृतियों और यौवन की गरिमा को फिर से अनुभव करती है। नृत्य के माध्यम से वह भक्ति, सौंदर्य और कला के उस स्वर्णिम युग को पुनर्जीवित करती है और दर्शकों को अपनी स्मृतियों की पवित्र दुनिया में आमंत्रित करती है।
इसके अलावा “मूर्छना वाद्य” नामक एक और जीवंत प्रस्तुति में ओडिशा की लोक परंपराओं की ऊर्जा को दर्शाया गया। इसमें विशेष रूप से मृदंग की शक्तिशाली तालों को केंद्र में रखा गया, जो ओडिशा के ग्रामीण जीवन और अनुष्ठानों की धड़कन मानी जाती है। इस रचना की कोरियोग्राफी में इन सशक्त लयों को गतिशील नृत्य मुद्राओं के माध्यम से प्रस्तुत किया गया, जिससे सामुदायिक उत्सवों की आनंदमय भावना और कलात्मक अभिव्यक्ति उजागर हुई।
कार्यक्रम में “सृष्टि तत्व” की भी प्रस्तुति दी गई, जो जयदेव द्वारा रचित दशावतार की अवधारणा से प्रेरित थी। इसमें सृष्टि की उत्पत्ति और विकास की दार्शनिक यात्रा को दर्शाया गया
इस अवसर पर केन्द्र की रजिस्ट्रार डॉ.शोभा कौसर,सचिव सजल कौसर ने कार्यक्रम के अंत में कलाकारों को मोमेंटो एवं उत्तरीया से सम्मानित किया