चंडीगढ़, 7 दिसम्बर: मीडिया में रिपोर्टों के अनुसार एनसीआर एरिया में प्रदूषण फिर से दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है और फरीदाबाद, गुरुग्राम, बल्लबगढ़ और दिल्ली आदि में जो प्रदूषण का स्तर है वह सेहत के लिए नुकसानदायक है, खासकर उनके लिए जिनको सांस की बीमारी है और बुजुर्ग आमतौर ऐसे मौसम में ज्यादातर संभावित परेशानियों से जूझते हैं। यह बात मीडिया को बयान देते समय इनेलो नेता चौधरी अभय सिंह चौटाला ने किसानों पर पराली जलाने के मामले के बारे में बात करते हुए सरकार को चेताया कि केवल वायु प्रदूषण का कारण किसान ही नहीं और भी कई ऐसे कारण हैं जिसकी वजह से दिन-ब-दिन वायु में प्रदूषण बढ़ता जा रहा है और सरकार केवल किसानों को ही प्रताडि़त करने पर लगी है।
इनेलो नेता ने बताया कि असल में इस सारे वायु प्रदूषण के दोषी कोई और हैं, जिन पर सरकार रहमोकरम की निगाह रखती है। अभी नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने पानीपत थर्मल पॉवर पर तीन करोड़ रुपए का जुर्माना लगाया है क्योंकि थर्मल पॉवर की राख की वजह से 90 प्रतिशत लोगों को सांस की, चमड़ी और आंखों आदि की बीमारियां दिन-प्रतिदिन बढ़ रही थी। उन्होंने कहा कि जब तक ऐसे कारखानेदारों, ईंट भ_ों के मालिकों और रिहायशी इलाकों में कूड़ा-कर्कट फैलाने वालों के विरुद्ध हरियाणा पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड सख्त कदम नहीं उठाएगा तब तक प्रदूषण पर काबू नहीं पाया जा सकता। यह ठीक है सरकार को नागरिकों के सहयोग की आवश्यकता है जिसके सहयोग से वायु प्रदूषण का स्तर कम किया जा सकता है। जैसे पंजाब में श्री बलबीर सिंह सींचेवाल ने वेईं नदी के जल प्रदूषण को सक्रियता से नागरिकों के सहयोग से निम्न स्तर पर लाकर एक उदाहरण प्रस्तुत किया है।
उन्होंने बताया कि ये तो स्पष्ट है कि केवल किसान ही इस वायु प्रदूषण के लिए जिम्मेदार नहीं है बल्कि ऐसे कारखाने जो कैमिकल युक्त पानी नदी-नालों में डालते हैं, भ_ों की चिमनियां आदि भी बराबर की जिम्मेदार हैं, जिन पर कानून का शिकंजा कसा जाना चाहिए। परंतु सरकार ने तो लगभग 2000 से ज्यादा किसानों पर केस दर्ज करके केवलमात्र वायु प्रदूषण को काबू करने का हल सोचा है। हरियाणा की संगठन सरकार से अगर ये पूछा जाए कि हरियाणा पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड ने अब तक कितने वायु प्रदूषित करने वालों के विरुद्ध केस दर्ज किए हैं और उनमें से कितनों को जेल की सलाखों के पीछे भेजा है। परंतु सच्चाई तो यह है कि जो केस न्यायालयों में इनके विरुद्ध चल रहे हैं, अधिकारियों की मिलीभगत से उन मामलों में सबूत जानबूझकर नहीं पेश किए जा रहे और वर्षों से अदालतों में मामले लटक रहे हैं।
हरियाणा सरकार को उच्चतम न्यायालय के आदेश के अनुसार जिन सीमांत किसानों ने पराली नहीं जलाई है उनको धान के न्यूनतम समर्थन मूल्य से अतिरिक्त 100 रुपए प्रति क्विंटल और प्रति एकड़ एक हजार रुपए मुआवजा तुरंत देना चाहिए परंतु सरकार ने तो 6 नवम्बर, 2019 से मुआवजे की तारीख तय की है जबकि न्यूनतम समर्थन मूल्य पर तो धान इस 6 नवम्बर से पहले लगभग 90 फीसदी बिक चुका था। इसलिए सरकार को ये मुआवजा तो उस धान पर भी देना चाहिए जो 6 नवम्बर से पहले बिक चुका था। असलियत में भाजपा की गठबंधन सरकार किसान विरोधी नीतियों में विश्वास रखती है और किसानों को दण्डित करने में हर्ष महसूस करती है इससे जाहिर होता है कि इसकी करनी और कथनी में दिन-रात का अंतर है क्योंकि मंत्रियों ने तो अपने भत्ते पहली कलम से ही बढ़ा लिए हैं परंतु किसानों के लिए यह कलम की स्याही सूखती लग रही है।